Reflections on a coursera course #1

Hi,

This is a series of posts that I will be writing as part of a coursera course that I am pursuing – ‘What Future  For Education’. This is the first post in this series where I have briefly shared my ideas on ‘How do we learn?’

I believe to clearly present my ideas on this topic, I would first like to begin by highlighting the difference between learning and knowing.

Knowing is essentially obtaining a new piece of information. For example, India got independence in the year 1947. This is a factual statement and one can gather this piece of information through a formal (teacher, textbook etc.) or an informal (parents, friends etc.) channel.

Learning, on the other hand, is about building perspective about a topic and being able to express one’s opinion on the same. For example, learning the background story of India’s independence including the contemporary social and political developments and the role of organisations and individuals in the independence movement is actually a learning process, which can happen through in either of the following (and may be more) ways:

a) Listening to ideas and opinions (not facts) of another individual (a teacher or a friend) on a topic

b) Discussing one’s own ideas with another individual

c) Expressing one’s thoughts as part of an assignment (as it enables one to reflect on what he/she thinks about a particular topic)

Comparing this to the learning of a more analytical and objective topic (for example how to find the square of a given number) is a more straightforward process, which can be explained as a step-by-step process:

Step 1: Knowing what ‘square’ of a number means

Step 2: Understanding the process of finding the square. For example, to find the square of a number, multiply the number by itself.

Step 3: Try the learned concept on a few examples

Sharing examples from my own learning experience:

A successful example of where this has worked for me is a philosophy course where users were encouraged to ask doubts outside the class also on a learning forum.

An unsuccessful example was learning Japanese, teachers taught us meaning of different words and gave us written assignments but I couldn’t pick it up because there was no application or usage of it outside classroom

Advertisements

उस दिन

IMG-20160613-WA0003

ना रात का नशा था,
ना सुबह की ताजगी
और ना ही शाम की थकान |

मैं तो भरी दोपहर में मिला था तुमसे,
यूँ ही बस बिना किसी बात के |
तुमसे मिलने की कोई ख़ास वजह लाता भी कहाँ से,
जब जिंदगी ही बड़ी बेखास सी हो गयी थी |

हमेशा से अलग कुछ शांत से थे तुम ,
जैसे मेरी ही तरह कुछ सोच रहे हो तुम भी |
तलाश रहे हो जवाब उन सवालों के,
जो अपने जवाबों की तरह खुद भी अधूरे से है |

तुम्हारी ख़ामोशी और खोयेपन में,
मुझे बिना मांगे अपने सवाल और जवाब दोनों मिल गए |
तुम अगर सागर हो कर भी निरुत्तर हो सकते हो
जीवन की अनिश्चित लहरों से,
मैं तो एक अदद इंसान हूँ, मेरी बिसात ही क्या है |

उस दिन अच्छा लगा तुम से मिल के समुन्द्र
उस दिन तुम्हारी ख़ामोशी ने सब कुछ कह दिया

सौदेबाज़ी

IMG_20160421_091156

 

ये सोच कर कलम थामी थी कि
आज तुम पर कुछ नही लिखूंगा 
कम्भक्त आज फिर मैं खुद से ही झूठ बोल रहा था |

जब हमारा ये रिश्ता बना,
मुझे लगा था सिर्फ़ दिलों की सौदेबाज़ी हुई है  
पर ख़यालात, नींद और वक़्त कब मुफ़्त मे तुम्हारे साथ हो लिए
कुछ पता ही नही चला

 किसी माहिर चोर की तरह,
अपने गालों के हिलकोरे और आँखों की गहराई मे
जैसे छुपा कर ले गयी हो तुम ये सब |

जब कभी सोचता हूँ इस सौदेबाज़ी के बारे में,
खुद को ठगा हुआ सा पाता हूँ 
पर फिर जब तुम्हे मुस्कुराते हुए अपने पास आते देखता हूँ
तो बचे हुए खुद को भी तुम पर न्योछावर करने का मन हो उठता है |

सोचा था आज तुम पर कुछ नही लिखूंगा
कम्भक्त, कोई खुद से ही कितना ही झूठ बोलेगा |

समझदारी

Gwalior Fort

जो दिन की हंसी को गर गौर से सुनते
रात के आंसुओं का कोलाहल जान जाते

जो नादानी को मेरी तुम समझ जाते
मेरी समझदारी पर जरूर नाज़ पाते

मेरे लाखों लफ़्ज़ों को जो कभी पड़ पाते
मेरी ख़ामोशी की गहराई में शायद डूब जाते

ना हंसी समझे , ना नादानियाँ

ना ही समझे सके तुम मेरी ख़ामोशी

बस इतना कह कर चले गए की मैं समझता नहीं ।

रात

 

Screen Shot 2016-05-18 at 4.49.37 am

 

 

यूँ लूटा मुझे,
जैसे कोई रात नींद चुरा ले गयी हो |
मैं तो यूँ भी तुम्हारा ही था,
देर सवेर खुद ही खुद को तुम्हे दे देता |
पर तुमने मुझे चुरा कर जो छुपा दिया है,
ना मैं तुम्हे खुद में ढूँढ पाता हूँ,
ना खुद को खुद में |
बस भटकता रहता हूँ किसी पथिक की तरह
जो महज मंज़िल का रास्ता नही, मंज़िल ही भूल गया हो
जैसे कोई रात नींद चुरा ले गयी हो
और ग़लती से निशानी मे छोड़ गयी हो ये कविता |

खामियाँ

 

IMG_20140608_154048मेहनत की बदबू
मोहब्बत का पागलपन
सपनो की बददिमागी
और तोह्फो की फ़िज़ूलखर्ची
के खुद को बिगाड़ा भी इस नज़ाकत से है तरुण
की हर खामी से प्यार हो जाए!