उस दिन

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ना रात का नशा था,
ना सुबह की ताजगी
और ना ही शाम की थकान |

मैं तो भरी दोपहर में मिला था तुमसे,
यूँ ही बस बिना किसी बात के |
तुमसे मिलने की कोई ख़ास वजह लाता भी कहाँ से,
जब जिंदगी ही बड़ी बेखास सी हो गयी थी |

हमेशा से अलग कुछ शांत से थे तुम ,
जैसे मेरी ही तरह कुछ सोच रहे हो तुम भी |
तलाश रहे हो जवाब उन सवालों के,
जो अपने जवाबों की तरह खुद भी अधूरे से है |

तुम्हारी ख़ामोशी और खोयेपन में,
मुझे बिना मांगे अपने सवाल और जवाब दोनों मिल गए |
तुम अगर सागर हो कर भी निरुत्तर हो सकते हो
जीवन की अनिश्चित लहरों से,
मैं तो एक अदद इंसान हूँ, मेरी बिसात ही क्या है |

उस दिन अच्छा लगा तुम से मिल के समुन्द्र
उस दिन तुम्हारी ख़ामोशी ने सब कुछ कह दिया

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