सौदेबाज़ी

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ये सोच कर कलम थामी थी कि
आज तुम पर कुछ नही लिखूंगा 
कम्भक्त आज फिर मैं खुद से ही झूठ बोल रहा था |

जब हमारा ये रिश्ता बना,
मुझे लगा था सिर्फ़ दिलों की सौदेबाज़ी हुई है  
पर ख़यालात, नींद और वक़्त कब मुफ़्त मे तुम्हारे साथ हो लिए
कुछ पता ही नही चला

 किसी माहिर चोर की तरह,
अपने गालों के हिलकोरे और आँखों की गहराई मे
जैसे छुपा कर ले गयी हो तुम ये सब |

जब कभी सोचता हूँ इस सौदेबाज़ी के बारे में,
खुद को ठगा हुआ सा पाता हूँ 
पर फिर जब तुम्हे मुस्कुराते हुए अपने पास आते देखता हूँ
तो बचे हुए खुद को भी तुम पर न्योछावर करने का मन हो उठता है |

सोचा था आज तुम पर कुछ नही लिखूंगा
कम्भक्त, कोई खुद से ही कितना ही झूठ बोलेगा |

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समझदारी

Gwalior Fort

जो दिन की हंसी को गर गौर से सुनते
रात के आंसुओं का कोलाहल जान जाते

जो नादानी को मेरी तुम समझ जाते
मेरी समझदारी पर जरूर नाज़ पाते

मेरे लाखों लफ़्ज़ों को जो कभी पड़ पाते
मेरी ख़ामोशी की गहराई में शायद डूब जाते

ना हंसी समझे , ना नादानियाँ

ना ही समझे सके तुम मेरी ख़ामोशी

बस इतना कह कर चले गए की मैं समझता नहीं ।

रात

 

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यूँ लूटा मुझे,
जैसे कोई रात नींद चुरा ले गयी हो |
मैं तो यूँ भी तुम्हारा ही था,
देर सवेर खुद ही खुद को तुम्हे दे देता |
पर तुमने मुझे चुरा कर जो छुपा दिया है,
ना मैं तुम्हे खुद में ढूँढ पाता हूँ,
ना खुद को खुद में |
बस भटकता रहता हूँ किसी पथिक की तरह
जो महज मंज़िल का रास्ता नही, मंज़िल ही भूल गया हो
जैसे कोई रात नींद चुरा ले गयी हो
और ग़लती से निशानी मे छोड़ गयी हो ये कविता |